मिथिला में आश्विन पूर्णिमा को ‘कोजगरा’ उत्सव मनाने की परंपरा प्राचीन काल से रही है

 कल कोजगरा है..



मिथिला में आश्विन पूर्णिमा को ‘कोजगरा’ उत्सव मनाने की परंपरा प्राचीन काल से रही है । समस्त मिथिला में इस पर्व का विशेष महत्व है । इस दिन लक्ष्मी पूजा और रात्रि-जागरण किया जाता है। विशेष रूप से नव विवाहित युवकों के यहां कोजागरा उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व में पान, मखान और बताशे का विशेष महत्व होता है। कई जगह देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और मेले का भी आयोजन किया जाता है। कोजागरा नवविवाहिताओं के रागात्मक जीवन के शुरुआत का त्योहार है। शादी के पहले साल दूल्हे के घर वधू पक्ष की ओर से बड़े से डाले (बाँस से बना वृहत वृत्ताकार आकृति) को दही, मधुर, मखान, पान एवं अन्य साजो-सामान से सुसज्जित कर उपहार स्वरूप (भार) भेजा जाता है । साथ ही वर पक्ष के लोगों के लिए नवीन वस्त्र देने की परंपरा भी है। आँगन-घर में नयनाभिराम अल्पना उकेर कर संध्या समय कोजागरा पूजन किया जाता है, जिसमें आसपास के लोगों को बुलाया जाता है। कौड़ी-पचीसी खेलने की विधि: पूजा के बाद लोगों के बीच मधुर मखान का वितरण किया जाता है। नव विवाहित वर को भार लेकर आने वाले अपने साला के साथ कौड़ी-पचीसी खेलने की विधि भी पूरी करनी पड़ती है। #farmyug#makhana#foxnut#ritual#organic#saharsha#sardiha#mithilamakhan



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